मैं और मैं कोई साधारण किताब नहीं है। यह एक व्यक्ति के भीतर चल रही जज़्बाती और मानसिक लड़ाई का दस्तावेज़ है। किताब दो “मैं” की बातचीत है — एक जो दुनिया के सामने दिखता है, और एक जो अंदर गूंजता है, जिसे कोई नहीं सुन पाता। गहरे और तीखे आत्मसंवाद के जरिए यह उन जज़्बातों और सवालों को सामने लाती है जिन्हें हम अक्सर दबा देते हैं। मैं और मैं हर उस इंसान की दास्तां है जो दिन में मुस्कराता है और रात में खुद से लड़ता है, और यह किताब पाठक को अपने अस्वीकृत हिस्सों से सामना कराती है।
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